फल-फूल रहा अवैध प्लाटिंग का काला कारोबार भूखंड खरीदने के बाद खरीदारों को झेलनी पड़ रही भारी परेशानियां
सिहोरा…प्रशासन की लापरवाही के चलते क्षेत्र में अवैध प्लाटिंग का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है। भूमाफिया और दलाल मिलकर अपने आशियाने का सपना देखने वाले आम लोगों को खुलेआम ठग रहे हैं। इतना ही नहीं, इस अवैध गतिविधि के जरिए शासन को भी भारी राजस्व हानि पहुंचाई जा रही है।
हालात इतने खराब हो चुके हैं कि जीवनभर की जमा पूंजी लगाकर जमीन खरीदने वाला व्यक्ति सुकून के बजाय परेशानियों का सामना कर रहा है। भूखंड खरीदने वाले कई लोगों ने बताया कि दलाल पहले खेतों में मुरुम डालकर कच्ची प्लाटिंग करते हैं और उसे विकसित कॉलोनी बताकर सुविधाओं के बड़े-बड़े वादे करते हैं। आकर्षक सपने दिखाकर लोगों को प्लॉट खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, लेकिन इसके बाद समस्याओं का सिलसिला शुरू हो जाता है।
पंजीयन शुल्क और अन्य खर्च देने के बावजूद, साइबर तहसील की प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए भूमि का नामांतरण समय पर नहीं हो पाता। यहीं से दलालों द्वारा शोषण का दौर शुरू होता है। सूत्रों के अनुसार, नामांतरण के लिए समय सीमा के आधार पर अलग-अलग “रेट” तक तय कर दिए गए हैं।
यदि किसी तरह नामांतरण हो भी जाता है, तो डायवर्सन, नगर पालिका में पंजीयन, अनुमति जैसी जटिल प्रक्रियाओं में फंसकर लोगों का घर बनाने का सपना टूटने लगता है। इसके अलावा होम लोन के लिए बैंकों के चक्कर अलग से परेशान करते हैं।
क्या है पूरा मामला
शासन ने राजस्व सेवाओं को सरल और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से साइबर तहसील व्यवस्था लागू की थी, ताकि संपदा पोर्टल के माध्यम से भूमि विक्रय के तुरंत बाद नामांतरण की प्रक्रिया स्वतः पूर्ण हो सके। नियमों के अनुसार, ई-पंजीयन होते ही भूमि विक्रेता के खाते से कटकर क्रेता के नाम दर्ज हो जानी चाहिए और संबंधित अधिकारियों की आईडी पर सूचना पहुंचकर तय समय में प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए।
लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है। नागरिकों का कहना है कि ऑनलाइन आवेदन के बावजूद नामांतरण, रिकॉर्ड सुधार और अन्य कार्यों में अनावश्यक देरी हो रही है। इससे लोगों को बार-बार तहसील कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
कई भूखंड खरीदारों के नाम आज तक राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं हो पाए हैं, जिससे वे अन्य जरूरी कार्य और दस्तावेजी प्रक्रियाएं पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
नियमों को धता बता रहे अधिकारी
जानकारी के अनुसार, सरकार की मंशा के विपरीत कुछ अधिकारी और कर्मचारी आज भी पुराने तरीके से काम कर रहे हैं। अवैध कॉलोनी, एक ही भूमि पर कई रजिस्ट्रियां जैसी आपत्तियां लगाकर नामांतरण प्रक्रिया को जटिल बना दिया जाता है।
सूत्र बताते हैं कि तहसील कार्यालय में एक सक्रिय नेटवर्क काम कर रहा है, जहां आम आदमी महीनों भटकता रहता है, जबकि इस नेटवर्क से जुड़े लोग नियमों को दरकिनार कर तुरंत नामांतरण करवा लेते हैं।
इस पूरे मामले ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं और आम जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा

