जबलपुर बरगी डेम क्रूज हादसा: क्रूर लापरवाही की कीमत

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जबलपुर//सिहोरा…..यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि बरगी डैम की लहरों पर लिखा गया उस भ्रष्ट तंत्र का काला सच है, जिसने विकास के नाम पर सिर्फ मौतें बांटी हैं। जिस क्रूज के साथ लोग डूबे, उसके साथ डूबा प्रशासन का इकबाल, नेताओं का जमीर और सुरक्षा व्यवस्था की पोल।
30 अप्रैल की वह शाम कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी। यह एक ऐसा “एडमिनिस्ट्रेटिव मर्डर” था, जिसकी पटकथा उन एसी कमरों में लिखी गई, जहां सुरक्षा मानकों को मुनाफे के लिए गिरवी रख दिया गया।
आज वही नेता, मंत्री और अधिकारी घटनास्थल पर ‘संवेदनाएं’ लेकर खड़े हैं। वही पुरानी कहानी—जांच के नाम पर लीपापोती, छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई और असली गुनहगारों को बचाने का खेल। सवाल यह है कि क्रूज संचालन की सुरक्षा व्यवस्था की आखिरी बार गंभीर जांच कब हुई थी?
इस हादसे का सबसे दर्दनाक दृश्य वह था, जब रेस्क्यू के दौरान मां से लिपटे बच्चे का शव मिला। यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का आईना है। जिस प्रशासन को लोगों को बचाने में घंटों लग जाते हैं, वही सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों की जांच मिनटों में कर लेता है।
अगर इतनी ही तेजी सुरक्षा मानकों के पालन में दिखाई जाती, तो शायद आज इतने घर उजड़ते नहीं।
हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां तकनीक का इस्तेमाल सच्चाई को दबाने के लिए तेज है, लेकिन जिम्मेदारी तय करने में सिस्टम आज भी सुस्त है। सस्पेंशन और जांच समितियां अब केवल जनता के गुस्से को शांत करने का जरिया बन चुकी हैं।
धिक्कार है उस व्यवस्था पर, जहां सत्ता की ताकत इंसानी जिंदगी से बड़ी हो गई है। जहां आम आदमी की जान की कीमत इतनी कम हो गई है कि हर हादसे के बाद सिर्फ बयान और मुआवजे ही बचते हैं।
यह पहली बार नहीं है जब जबलपुर ने ऐसी त्रासदी देखी है। कभी अस्पताल में आग, कभी बारिश में बहते नाले, और अब यह क्रूज हादसा—क्या इस शहर की तकदीर में सिर्फ हादसे ही लिखे हैं?
जबलपुर अब जांच नहीं, जवाब चाहता है।
जबलपुर अब संवेदनाएं नहीं, जिम्मेदारी चाहता है।
और सबसे बढ़कर—जबलपुर अब न्याय चाहता है।

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